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Understanding Women Body

मां बनने से पहले इन बातों को जान लेंगे तो आसानी होगी

प्रजनन अंग :

दो अंडकोश – एक बाई और एक दायीं ओर| इनमें स्त्री के अंडों का उत्पादन होता है|
एक गर्भाशय जो नाशपाती फल के आकार की एक छोटी थैली है, जहाँ नौ महीने बच्चे का  विकास होता है|

गर्भाशय की दो नालियाँ – एक बाई और एक दायीं ओर|  नली में गर्भधारण होता है|

गर्भाशय का गला – जहाँ पूरे महीने धात का उत्पादन होता है|

गर्भाशय के अंदर का अस्तर – जो हर महीने फट कर गिरता है| (इसके कारण हर महीने खून बहता है; जिसे माहवारी के नाम से जाना जाता है)

गर्भाशय द्वार – जो बच्चे के जन्म का नहर है|

योनि – जो बच्चे के जन्म के नहर का बाहरी अंग है|

प्रजनन  स्वास्थ्य से संबंधित भ्रांतियाँ

भ्रांति :  एक बार के संभोग से स्त्री गर्भवती नहीं हो सकती है|

सच :  हर बार संभोग से गर्भवती होने का खतरा है|

भ्रांति : दो मासिक धर्मों के बीच का समय संभोग के लिए सबसे सुरक्षित है क्योंकी उस समय गर्भधारण का डर नहीं होता|

सच :  ज्यादातर females में (जिनका मासिक चक्र 28 दिनों का है) सबसे fertile period मासिक धर्मों के बीच 2 से 6 दिनों की होती है यानी 28 दिनों के मासिक चक्र के 10वें से 18वें दिन तक| इन दिनों को ‘बच्चे वाले दिन’ या ‘उर्वरक दिन’ या Fertile Period कहा जाता है|

भ्रांति : परिवार नियोजन और प्रजनन स्वास्थय के बारे में जानकारी प्राप्त करना बुरी बात है|

सच :  परिवार नियोजन के बारे में जानकारी या ज्ञान होने से असुरक्षित संभोग के बुरे नतीजों का पता रहता है और अनचाहे गर्भावस्था तथा यौन रोगों से बचा जा सकता है प्रजनन स्वास्थय का ज्ञान हो तो अपनी देह के बारे में पूर्ण जानकारी होती है, उसके कामों को जानने तथा उसकी देखभाल करने में सहूलियत होती है| इसलिए इनकी जानकारी बेहद अहम है|

भ्रांति : मासिक धर्म के दौरान स्त्री गंदी हो जाती है और से छूना नहीं चाहिए|

सच :  सभी स्त्रियों में मासिक धर्म एक स्वाभाविक प्रक्रिया है उनकी योनि से जो खून बाहर निकलता है; वह गंदा नहीं होता है|

भ्रांति : मासिक धर्म के समय नहाना नहीं चाहिए|

सच :  मासिक धर्म चूंकि एक स्वाभाविक क्रिया है, इसलिए नहाने को लेकर कोई पाबन्दी नहीं हैं  सच तो यह है कि इस समय शरीर को स्वच्छ रखना बहुत जरूरी है, जिससे प्रजनन अंगों में संक्रमण न होने पाए|

भ्रांति : अगर हाईमेन (योनिछेद या योनि-पर्दा) फट जाए तो लड़की कुँवारी/Vergin नहीं मानी जाएगी|

सच :  यह सही नहीं हैं| क्योंकि हाईमेन (पर्दा) बिना संभोग के भी फट सकता है, मसलन खेलकूद से बोझ उठाने से, गिर जाने से या मासिक धर्म के वक्त| यदि योनि में पैड्स रखे जाएँ तब भी परदा फट जाता है| कभी-कभी हाईमेन स्वत: ढीला होता है, या होता ही नहीं है और

भ्रांति :  अगर स्त्री में यौन उत्तेजना नहीं होती तो वह गर्भवती नहीं हो सकती है|

सच :   स्त्री उत्तेजित हो या नहीं, अगर पुरूष उसकी योनि में या योनि के आस पास वीर्य गिरा देता है तो स्त्री गर्भवती हो सकती है|

भ्रांति : किशोरावस्था में सेक्स की कल्पना करने से, या मूड बदलने से नुकसान होता है|

सच :  किशोरावस्था में घटित होने वाले ये महज स्वाभाविक भावनात्मक परिवर्तन हैं|

भ्रांति : परिवार नियोजन स्वास्थय के लिए नुकसानदेह है|

सच :  परिवार नियोजन, परिवार के स्वास्थ्य और प्रजनन स्वास्थय की बेहतर के लिए अपनाया जाने वाला तरीका है|

Periods/मासिक धर्म या माहवारी

मासिक धर्म के आंरभ होने पर एक बलिका स्त्री में परिवर्तित हो जाती है| इस सारे घटना चक्र में बीज ग्रंथियां मुख्य भूमिका निभाती है| E एवं P नामक hormone इन्हीं ग्रंथियों में बनते व बाहर निकलते हैं| हमारे मस्तिष्क में Pituitary Gland है जो शरीर की दूसरी ग्रंथियों(Glands) से निकलने वाले ई एवं पी हार्मोनों की मात्रा शरीर में कम व अधिक होती रहती है| गर्भाशय में इसी के अनुसार प्रतिक्रिया होती है जो मासिक धर्म के रूप में प्रकट होती है|

जब कोई लड़की मासिक धर्म(Periods) की उम्र को पहुचंती है तो इसके पिट्यूटरी ग्रंथी उसके डिम्ब(Ovary) ग्रंथियों(Ovary) को रासायनिक संकेत भेजती है| इन संकेतों के मिलने पर डिम्ब(Ovary) ग्रंथियों ई हार्मोन को रक्त में भेजती हैं| यह हार्मोन शरीर में कई परिवर्तन पैदा करता है| इनका मुख्य प्रभाव गर्भाशय पर पड़ता है|  इसके द्वारा गर्भाशय के भीतर एक झिल्ली का कवर तैयार होता है| इसका आप यूं समझिए जैसा वर्षा से पहले बीज बोने के लिए जमीन तैयार की जाए| यह प्रतिक्रिया पहले दो हफ्तों तक होती है|  E हार्मोन से कुछ गहरे प्रभाव होते हैं जैसर स्तनों का भारी होना, शरीर में चर्बी बनना और शरीर कुछ नमक व पानी का इकट्ठा होना| इसके अलावा बगल और गुप्तांग के आस – पास बालों पर उगना भी ई हार्मोन के प्रभाव के कारण ही होता है| यह हार्मोन इन स्थानों पर बाल उगाता है और चेहरे पर बाल उगने से रोकता है| इसलिए स्त्रियों के चेहरे पर दाढ़ी मूंछे नहीं पाई जाती|

दस दिन बाद शरीर में ई हार्मोन का स्तर गिरने लगता और पी का स्तर बढ़ने लगता है| पी गर्भाशय गर्भित डिम्ब(Ovary) को अपने अंदर रखने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाता है| अगर इस दौरान स्त्री का डिम्ब(Ovary) गर्भित नहीं होता है तो बेकार जाता है| इसी तरह गर्भाशय की पूरी तैयारी भी बेकार हो जाती है| समय पूरा हो जाने पर गर्भाशय में जो झिल्ली तैयार हुई थी वह उखाड़ने लगती है| उसके साथ कुछ खून भी बाहर आता है| यह 2 से 4 दिनों तक आता रहता है| यही माहवारी है| इसके समाप्त होने पर ई हार्मोन फिर सक्रिय हो जाता और अगले चक्र की तयारी करने लगता है| चक्र 28 दिन का होता है|

मासिक धर्म या माहवारी 12 सर 15 वर्ष की उम्र आरंभ होती है| स्त्री गर्भवती हो तो यह माहवारी गर्भ के पूरे 9 महीनों तक रूक जाती है| 45-50 की उम्र के बीच यह धीरे धीरे बंद हो जाती है| इसलिए स्त्री के लिए गर्भवती होने और बच्चे पैदा करने की उम्र 15 से 45 बीच है|

गर्भधारण करने का समय

ऊपर 28 दिन के जिस चक्र वर्णन किया गया है उसके बीच में किसी समय स्त्री का डिम्ब(Ovary) बाहर आता है| इसका जीवन 48 घंटो का होता है| पुरूष के शुक्राणु या बीच का जीवन काल भी 24 से 28 घंटे है| हर माहवारी चक्र में डिम्ब(Ovary) के बाहर आने की तिथि 1 से तीन दिन के बीच हो सकती है| इसलिए गर्भ धारण का संभावित समय मासिक चक्र के बीच 4 से 6 दिन का होता है| परिवार नियोजन के प्राकृतिक तरीकों की भाषा में इसे असुरक्षित समय कहा जाता है| इस समय स्त्री के गर्भवती होने की पूरी संभावना होती है|

प्रजनन क्षमता की जाँच के लिए योनि स्राव की जाँच भी की जा सकती है| स्त्री स्वयं उसे दो उँगलियों के बीच लेकर देख सकती है| यदि ऊँगली अलग करने पर वह साफ और धागे की तरह खींचता दिखाई दे तो गर्भ धारण करने की लिए यह समय उपयुक्त है| दुसरे समय में जिसमें जनन क्षमता नहीं है, और जिसे सुरक्षित कहा जाता है, डिम्ब (Ovary) गर्भ धारण करने के लिए तैयार नहीं होता| माहवारी आरंभ होने के पहले व बाद के 8-10 दिन आम तौर पर सुरक्षित रहते हैं| इन दिनों में योनि स्राव गाढ़ा, सफेद व अपारदर्शी हो जाता है| खींचने पर इसमें धागा नहीं बनता|

डिम्ब (Ovary) उत्सर्ग(Discharge) के समय शरीर के कुछ सामान्य बदलाव

डिम्ब(Ovary) ग्रंथि से डिम्ब (Ovary) बाहर आने की प्रक्रिया डिम्ब (Ovary) उत्सर्ग कहलाती है| इस समय स्त्री के शरीर में कुछ बदलाव आते है| इन पर ध्यान दिया जाए तो यह अनुमान लगाना संभव हो सकता है कि डिम्ब (Ovary) किस दिन बाहर आ रहा है| यह बदलाव कुछ इस प्रकार है :

  • स्तनों का भारीपन बहुत बढ़ जाता है|
  • शरीर का तापमान एक डिग्री बढ़ जाता है|
  • योनि से रिसने वाला तरल पदार्थ साफ, पारदर्शी, पतला और लसदार(Mucilaginous) होता है|

रक्तस्राव का समय(Periods Duration)

आमतौर पर रक्त स्राव (Periods) आरंभ होने के दिन को माहवारी का आरंभ माना जाता है| आमतौर पर माहवारी का खून पहले धब्बों के रूप में बाहर आता है| फिर इसके मात्रा बढ़ जाती है| अब महिला को कपड़े की गद्दी लेने की आवश्यता होती है| दूसरे या तीसरे दिन से रक्तस्राव में कमी आने लगती है| अगले एक या दो दिन में यह समाप्त हो जाताहै इस तरह रक्त 2 सर 5 दिन तक जारी रह सकता है| अलग अलग females में रक्त की मात्रा अलग अलग हो सकती है| यदि हम इसे गद्दी बदलने के अनुसार नापें तो 24 घंटों में 1 से 3 गद्दियाँ बदली जा सकती है| मासिक धर्म की ये भिन्नता सामान्य है|

प्रजनन  क्रिया

गर्भधारण एक नये जीवन की शूरूआत है जो डिम्ब नलिका में शुक्राणु(Sperm) और डिम्ब(Ovary) के मिलने पर होती है|

भूर्ण गर्भाशय की ओर बढ़ता है और उसकी भीतरी सतह से जुड़ जाता है, जहाँ एक मोटा और गूदगुदा अंग बनाता है| इसे प्लेसेंटा कहते है| प्लेसेंटा का एक हिस्सा गर्भाशय की भीतरी दिवार से जुड़ता है| दूसरा हिस्सा नाल से जुड़ता है| भ्रूण यानी विकसित हो रहे बच्चा इसी नाल द्वारा प्लेसेंटा से जुड़ता है| भ्रूण को खून की सप्लाई माँ के शरीर से, प्लेसेंटा के जरिए ही मिलती है|

भ्रूण के चारो ओर पानी की एक थैली होती है, जो उसे झटकों, धक्कों और बाहरी चोटों से बचाती है| लगभग नौ महीनों में, अंडा एक पूरी तरह विकसित मानव-शिशु का आकार पा जाता है, जो अब जन्म लेने के लिए तैयार है| इसका वजन लगभग तीन किलो होता है|

गर्भावस्था के दौरान स्त्री कई शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों से गुजरती है| शरीरिक परिवर्तन इसलिए होते हैं कि उसके शरीर को गर्भावस्था, प्रसव और स्तनपान के समय, शिशु की कई जरूरतों को पूरा करना पड़ता है|

गर्भ का विकास(Development of Baby)

शिशु को, पानी की थैली को, और प्लेसेंटा को संभालने के लिए गर्भाशय लगातार बड़ा होता जाता है| 12 हफ्तों के बाद शिशु इतना बड़ा हो जाता है कि पेट के बिलकुल निचले हिस्से में, (जहाँ योनि के पास के बालों की शुरूआत होती है), उसे छूकर महसूस किया जा सकता है| इस समय के आड़ वह 36वें हफ्ते तक 2 अंगूलियों की चौड़ाई के बराबर प्रतिमाह बढ़ता रहता है| भ्रूण का बढ़ना, गर्भाशय के बढ़ने से मालूम किया जा सकता है| 20 हफ्ते पूरे होने पर इसे नाभि के पास महसूस किया जा सकता है| 36वें हफ्ते तक गर्भ छाती की पसलियों तक उठ जाता है| इसके बाद वह 2 या 2 अंगूलियों तक उठ जाता है| फिर वह 2 या 3 की चौड़ाई के बराबर कम भी हो सकता है, क्योंकि भ्रूण पेडू में उतरने लगता है|

Changes During Pregnancy

खून में परिवर्तन:

शिशु की बढ़ती हुई जरूरत को पूरा करने के लिए, और स्त्री के बढ़े हुए आकार के अनुपात में, खून की मात्रा 30 प्रतिशत बढ़ जाती है, इससे रक्त ‘पतला’ हो जाता है और एनीमिया हो जाता है| यह एक सामान्य प्रक्रिया है जो कुछ सप्ताह बाद ठीक हो जाती है क्योंकि तब तक लाल खून के सेल रक्त की ‘कमी’ को, या उसके पनीलेपन को पूरा करने के लिए बढ़ जाते हैं| लाला खून के सेल बढ़ाने के लिए स्त्री को अच्छी खुराक लेनी चाहिए जिसमें आयरन, फौलिक एसिड और प्रोटीन प्रचुर मात्रा में हो| जैसे – हरी पत्तेदार सब्जियाँ, दालें, फलियाँ, आंवला, केला, अमरुद, और सेब जैसे फल आदि| बहरहाल केवल खुराक के द्वारा स्त्रियों की बढ़ी हुई जरूरतों को पूरा करना कठिन होता है, और कई स्त्रियाँ जब गर्भ धारण करती हैं तो वे पहले से ही कमजोर होती हैं इसलिए खुराक की कमी को आयरन और फोलिक एसिड गोलियां से पूरा करें|

स्तनों में परिवर्तन

स्तन बड़े और भारी हो जाते हैं| यह परिवर्तन इसलिए होता है कि स्तन दूध पिलाने के लायक हो जाएँ| निप्पल के पास की त्वचा काली हो जाती है और निप्पल ऊपर की ओर उठ आते हैं| गर्भावस्था के शुरू होने के साथ ही कई बार निप्पल से एक पीला द्रव रिसने लगता है| शुरू का दूध वसा और प्रोटीन से भरा होता है| प्रसव के बाद इसकी मात्रा बढ़ती जाती है|

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